रघुकुल रीत सदा चली आई | प्राण जाई पर वचन न जाई ||परहित बस जिन्ह के मन माहीं। तिन्ह कहुँ जग दुर्लभ कछु नाहीं ||भावार्थ : जिन लोगों के मन में दूसरों का हित होता है, उनके लिए दुनिया में कुछ भी मुश्किल नहीं है |पर हित सरिस धर्म नहिं भाई। पर पीड़ा सम नहिं अधमाई ||निर्नय सकल पुरान बेद कर। कहेउँ तात जानहिं कोबिद नर ||भावार्थ : हे भाई! दूसरों की भलाई के समान कोई धर्म नहीं है और दूसरों को दुःख पहुँचाने के समान कोई नीचता (पाप) नहीं है |रघुकुल रीत सदा चली आई | प्राण जाई पर वचन न जाई ||परहित बस जिन्ह के मन माहीं। तिन्ह कहुँ जग दुर्लभ कछु नाहीं ||भावार्थ : जिन लोगों के मन में दूसरों का हित होता है, उनके लिए दुनिया में कुछ भी मुश्किल नहीं है |पर हित सरिस धर्म नहिं भाई। पर पीड़ा सम नहिं अधमाई ||निर्नय सकल पुरान बेद कर। कहेउँ तात जानहिं कोबिद नर ||भावार्थ : हे भाई! दूसरों की भलाई के समान कोई धर्म नहीं है और दूसरों को दुःख पहुँचाने के समान कोई नीचता (पाप) नहीं है |